एक वो कॉलेज का पहला दिन था और अब ये आखिरी....पहले दिन मन मे थोड़ी घबराहट थी और सब जानने की उत्सुकता तो वही आखिरी दिन मन थोडा उदास आखों मे आंसू भी थे,, की अब दोस्तों से अलग हो जायेंगे कौन पता नहीं कहा जाये... कब मिले...सारी मौज मस्ती.... सब पे.... फुल स्टॉप लग जायेगा,और अब कॉलेज आने का बहाना भी खत्म हो जायेगा... ये तो पता था की ऐसा होना है एक दिन पर जब ये हुआ तो इतनी आसानी से दिल स्वीकर नहीं कर पा रहा था.कही न कही मन मे उथल पुथल थी की काश ये वक़्त यही ठहर जाये....... पर वो वक़्त आया भी और चला भी गया.,,,और हम देखते रह गये...इसके अलावा ख़ुशी थी इस बात की हम अब GRADUATE हो गये.... और अपनी मंजिल की तरफ जाती सीढियों का एक पायेदान और चढ़ लिए...और ज़िन्दगी की असली रूप देखने के थोड़े से और काबिल हो गये......
कभी कभी थोड़े confuse हो जाते है की इन सब बातो पे खुश हो या दुखी...... बचपन जहा छुटता जा रहा है वही हम दिखावे और ढोंग की तरफ बढ़ते जा रहे है .......
जब नया नया कॉलेज ज्वाइन किया था तो कोई एक दुसरे को इतना नहीं जनता था फिर धीरे धीरे जान पहचान बढ़ी... जान पहचान के साथ दोस्ती बढ़ी और ये दोस्ती कब इतनी गहरी होती गयी इसका अंदाज़ा फ़ाइनल इयर मे आके पता चला...बात की जाये हमारे ग्रुप की तो...hm ,,,, bhawna tewari ,,, anamta,, bhawna kapoor or pransha यही तक सिमित है हमारा ग्रुप पर जो आपस की तगड़ी वाली बोन्डिंग है वो है हमारे भावना tewari और anamta के बीच ही है,,,,और उम्मीद की आगे ही रहेगी...
वैसे हमारे ग्रुप को छोड़ दे तो और भी हमारे अच्छे साथी थे....जिन्होंने हमारा साथ शुरू से आखिरी तक दिया... याद आता है वो पल जब हमलोग क्लास बंग करके इधर उधर छुपने की जगह ढूंढा करते थे... पर ये है की मुकुल सर की क्लास कभी बंक नहीं की इन तीन सालो मे.. बाकी चाहे जिस भी टीचर की की हो ...... और क्लास के पीछे डांट भी बहुत खाई... पर हम लोग भी सुधरने वाले कहा थे...... एक दिन serious हुए फिर दुसरे दिन से अपना पुराना हिसाब शुरू.... और टीचर का मजाक उड़ाना या उनकी नक़ल उतरना इस काम मे तो मानो कितनी ख़ुशी मिलती हो...
इन तीन सालो मे कैंटीन के भी बहुत चक्कर लगाये ..आप lucknow university मे पढाई करे और आपका कैंटीन से नाता न हो ये थोडा सुनने मे अजीब लगता है... चाहे वो तोता राम की कैंटीन हो या मोटा भाई या अपनी पुरानी और टिकाऊ आर्ट्स कैंटीन ..... जहा फर्स्ट इयर मे आर्ट्स कैंटीन के दीवाने हुआ करते थे वही सेकंड और थर्ड इयर मे आते आते तोता राम की कैंटीन की आदत लग गयी..... कैंटीन का मतलब तो बस वही cutting चाय और गरमा गरम समोसा हुआ करता था...
हमारे graduate होने मे हमारे डिपार्टमेंट के बाहर की सीडियों का बहुत बड़ा योगदान टाइप का है.... पहले दिन से कॉलेज के आखिरी दिन तक हमलोग का सीडियों का मोह नहीं छुट पाया... कई बार तो ऐसा होता था की वह बैठने के लिए या यो इंतज़ार करना पता था या तो सीडियों को घेरना पड़ता था की और कोई और न बैठ जाये ,,,दरअसल क्या है न की वहा सीडियों पे बैठने वालो की संख्या ज्यादा होती थी.... ....... अब कॉलेज की बात की जाये और crushes or flirtung की बात न की जाये तो थोडा अधुरा सा लगता है.... हमारे क्लास मे भी इन तीन सालो मे कई लोगो को कई लोगो पे बिक्कट वाले crushes हुए.. कुछ बन गये तो कुछ टूट गए और कुछ तो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गये....
वैसे तो हमारे क्लास मे इतनी unity नहीं थी पर जब ऐसी वैसी कोई बात हो जाये फिर तो बस मतलब लगता था की सब कितने अच्हे और गहरे दोस्त है.... मुझे याद है जब हाल ही मे हमारे ग्रुप पे कुछ लोगो ने कमेन्ट किया था और हमारे साथ मे लड़ाई करने के लिए काफी लोग भी खड़े हो गये थे,,,पर ऐसा कुछ हुआ नहीं...
अब देखना है कहा तक इन यादो को सजो के रख पाते है,,,,,, उम्मीद है फिर लौटेंगे यही.!!!!!



really touching post neha.........clg k din ko koi kabi b nahi bhul pata hai ......
ReplyDelete(n!k)
अच्छा लिखा पढकर मज़ा आया पर लिखने में निरंतरता बनाये रखो
ReplyDeleteoye hmein bhul gyi........ bt i know ur group is very good,.........
ReplyDeletegood writing......... Always keep smile...
aur hme bhi yaad rakh....
nice epic style..keep writing neha ji
ReplyDelete