koshish

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Sunday, May 22, 2011

GRADUATE HO GYE YAAR..............!!!!!!!!!!

एक वो कॉलेज का पहला दिन था और अब ये आखिरी....पहले दिन मन मे थोड़ी घबराहट थी और सब जानने की  उत्सुकता तो वही आखिरी दिन मन थोडा उदास आखों मे आंसू भी थे,, की अब दोस्तों से अलग हो जायेंगे  कौन पता नहीं कहा जाये... कब मिले...सारी मौज मस्ती.... सब पे.... फुल स्टॉप लग जायेगा,और अब कॉलेज आने का बहाना भी खत्म हो जायेगा... ये तो पता था की ऐसा होना है एक दिन पर जब ये हुआ तो इतनी आसानी से दिल स्वीकर नहीं  कर पा रहा था.कही न कही मन मे उथल पुथल थी की काश ये वक़्त यही ठहर जाये....... पर वो वक़्त आया भी और चला भी गया.,,,और हम देखते रह गये...इसके अलावा ख़ुशी थी इस बात की हम अब GRADUATE हो गये.... और अपनी मंजिल की तरफ जाती सीढियों का एक पायेदान और चढ़ लिए...और ज़िन्दगी की असली रूप देखने के थोड़े से और काबिल हो गये......
 कभी कभी थोड़े confuse हो जाते है की इन सब बातो पे खुश हो या दुखी...... बचपन  जहा  छुटता जा रहा है वही हम दिखावे और ढोंग की तरफ बढ़ते जा रहे है .......
जब नया नया कॉलेज ज्वाइन किया था तो कोई एक दुसरे को इतना नहीं  जनता था फिर धीरे धीरे जान पहचान बढ़ी... जान पहचान  के साथ दोस्ती बढ़ी और ये दोस्ती कब इतनी गहरी होती  गयी इसका अंदाज़ा  फ़ाइनल  इयर मे आके पता चला...बात की जाये हमारे ग्रुप की तो...hm ,,,, bhawna tewari ,,, anamta,, bhawna kapoor or pransha यही तक सिमित है  हमारा ग्रुप पर जो आपस की तगड़ी वाली  बोन्डिंग है वो है हमारे भावना tewari और anamta के बीच ही है,,,,और उम्मीद की आगे ही रहेगी...
वैसे हमारे ग्रुप को छोड़ दे तो और भी हमारे अच्छे साथी थे....जिन्होंने हमारा साथ शुरू से आखिरी तक दिया...   याद आता  है वो पल जब हमलोग क्लास बंग करके इधर उधर छुपने की जगह ढूंढा करते थे... पर ये है की मुकुल सर की क्लास कभी  बंक नहीं  की इन तीन सालो मे.. बाकी चाहे जिस भी टीचर  की की हो ...... और क्लास के पीछे डांट भी बहुत खाई... पर हम लोग भी सुधरने वाले कहा थे...... एक दिन serious हुए फिर दुसरे दिन से अपना पुराना हिसाब शुरू.... और टीचर का मजाक उड़ाना या उनकी नक़ल उतरना इस काम मे तो मानो कितनी ख़ुशी मिलती हो...
इन  तीन सालो मे कैंटीन के भी बहुत चक्कर लगाये ..आप lucknow university मे पढाई करे और आपका कैंटीन से नाता न हो ये थोडा सुनने मे अजीब लगता है... चाहे वो तोता राम की कैंटीन हो या मोटा भाई या अपनी पुरानी और टिकाऊ आर्ट्स कैंटीन ..... जहा फर्स्ट इयर मे आर्ट्स कैंटीन के दीवाने हुआ करते थे वही सेकंड और थर्ड  इयर मे आते आते तोता राम की कैंटीन की आदत लग गयी..... कैंटीन का मतलब तो बस वही cutting चाय और  गरमा गरम समोसा हुआ करता था... 
हमारे graduate होने मे हमारे डिपार्टमेंट के बाहर की सीडियों का बहुत बड़ा  योगदान टाइप का है.... पहले दिन से कॉलेज के आखिरी दिन तक हमलोग का सीडियों का मोह नहीं  छुट पाया... कई बार तो ऐसा होता था की वह बैठने के लिए या यो इंतज़ार करना पता था या तो सीडियों को घेरना पड़ता था की और कोई और न बैठ  जाये ,,,दरअसल क्या है न की वहा सीडियों पे बैठने वालो की संख्या ज्यादा होती थी....


....... अब कॉलेज की बात की जाये और crushes or flirtung की बात न की जाये तो थोडा अधुरा सा लगता है.... हमारे क्लास मे भी इन तीन सालो मे कई लोगो को कई लोगो पे बिक्कट वाले  crushes हुए.. कुछ बन गये तो कुछ टूट गए और कुछ तो शुरू होने से पहले ही खत्म हो गये.... 
वैसे तो हमारे क्लास मे इतनी unity नहीं थी पर जब ऐसी वैसी कोई बात हो जाये फिर तो बस मतलब लगता था की सब कितने अच्हे और गहरे दोस्त है.... मुझे याद है जब हाल ही मे हमारे ग्रुप पे कुछ लोगो ने कमेन्ट किया था और हमारे साथ मे लड़ाई करने के लिए काफी लोग भी खड़े हो गये थे,,,पर ऐसा कुछ हुआ नहीं...
 अब देखना है कहा तक इन यादो को सजो के रख पाते है,,,,,, उम्मीद है फिर लौटेंगे यही.!!!!!

Sunday, April 3, 2011

TREAT HO JAYE........

ओए,मैंने नया मोबाइल लिया है ... ज्यादा महंगा तो नहीं  है पर हां ठीक ठाक है ...
अरे वाह,,, फिर तो treat होनी चाहिए ... अबे कैसी treat कौन सा बहुत महंगा लिया है या अपनी मेहनत की कमाई से लिया है जो treat treat चिल्लाने लगे  ....     ये कोई बात नहीं  होती देनी तो पड़ेगी....  यार कुछ तो खिलाओ ........ हां तुम लोगो को तो बस बहाना चाहिए,फिर चाहे वो पेन की क्यों न लिया हो...,,, अच्छा  अब ज्यादा 3-5   मत करो चलो कैंटीन .............
                 ये वो पल होते है जो लगभग हर हर वो इन्सान जो student life जी चूका है,, उसकी लाइफ मे  हर तीसरे दिन आते है, treat तो जैसे आशीर्वाद की तरह है की बस बाटते चलो और लेना वाला दोनों हाथ फैलाये लेता चले....  और अगर देने वाला तैयारी के साथ आया है तब तो ठीक है वरना तो बस बैंड बजनी तय  है..... पर उन पालो की याद करके  एक हलकी सी मुस्कान भी आ ही जाती है ..... और इसी से जुडी है कुछ खट्टी और कुछ मीठी यादे ...  आइये उन  कुछ हसीन पलो पर नज़र डालते है ....  वैसे घटना तो बहुत है पर कुछ ऐसी होती है जो हमेशा के  लिए जहन मे बस जाती है.... बात है तब की जब हम bjmc 1st सेमेस्टर मे होंगे ... सबका नया नया कालेज  था नए दिन थे, दोस्ती की शुरुआत हो रही थी सबकी उस दौरान हम करीब 8 -९ लोग  थे जो की रोज़ क्लास होने के बाद कैंटीन का रुख कर देते थे .... वजह कुछ नहीं  होती थी फिर भी ,,,,रोज़ का नियम हो गया था एक के पीछे पड़ जाना और उसका खर्चा कर के ही मानना,,पर हमारा एक फ्रेंड हुआ करता था,,,, मतलब अबी भी है  पर अब उतना contact मे नहीं तो मतलब ऐसा था की हमलोग बरसे किसी पे भी,पर खर्चा  वो ही करता था.... और एक टाइम तो ऐसा आ गया की कैंटीन मे उसके 500-600 रुपये  उधार  हो गये थे,........ वो भी एक दिन हुआ करते थे पर अब वैसा कुछ नहीं है....... टाइम बदल गया है,और treat के मायने भी.....
   पर गाहे बगाहे treat हो ही जाती है.... पर वजह कुछ खास नहीं होती ,,और वक़्त की कमी भी होती है और साथ ही अनेकों परेशानिया भी होती है..........

Sunday, March 6, 2011

झुंझलाहट . . . . . . . . . . .

अक्सर ऐसा होता सभी  के साथ, की जब इन्सान अपना आपा खो बैठता है और  बेकाबू की स्थिति मे आ जाता है तो उस स्थिति को कहते है गुस्सा, पर अगर वो अपने गुस्से को निकाल नहीं  पाता तो उस स्थिति को कहते है frustation   जिसे वो उसी गुस्से  की स्थिति मे जहर के घुट की तरह पी तो जाता है पर उसे पचा नहीं पाता और फिर वही से शुरू हो जाता है उसका तिल तिल  मरना .और वो मजबूर हो जाता है मरने के लिए  ......क्यों की वो कुछ कर नहीं सकता लाख  चाह कर भी ....... और कई बार न चाहते हुए भी वो  इतना मजबूर हो के वो ऐसे काम करता है कभी कभी अनजाने मे या कभी कभी  जान बुझ के भी जो उसके लिए और उससे जुड़े लोगो क लिए बहुत कष्टकारी भी  होते है,पर मज़बूरी ये आ जाती  है की क्यों की वो कुछ कर नहीं सकता कुछ कह नहीं सकता , इस लिए उस गलत रास्ते पर चलते हुए और सब सोचते हुए भी वो सब भूल जाना चाहता है और उसे उस वक़्त वो सब काम सही लगता है  जो असल मे होता गलत है....,,,, उसका ऐसा इरादा नहीं  होता की वो अपनों को दुःख पहुचाये, पर वो इतना  कुंठित हो चूका होता है की इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं मिलता उसे ........ 
कहना  तो वो बहुत कुछ चाहता है और करना भी वो बहुत कुछ चाहता है  पर ये जो मज़बूरी होती है न वो कुछ करने नहीं देती..... क्यों की उसे कही न कही ये डर भी होता है की इसका उल्टा असर न हो जाये.... और बात कही और ज्यादा न बिगड़ जाये........ और ऐसे ही तिल तिल मर के वो अपना सब ख़तम भी कर देता है....   और सब ख़तम करने का  उसे दुःख तो होता है पर इनता सब झेलने के बाद  उस  दुःख का एहसास कम हो जाता है...... 
झुंझलाहट जिसे देखा जाये तो सिर्फ एक  शब्द है.... पर असल मे अगर आप इसकी गहराई मे जाये तो ये कितनो को बना और बिगड़ सकता है.... किसी को झुंझलाहट है कुछ न कर पाने की,,,तो किसी का डर, उसकी झुंझलाहट का कारण है....
पर इन सब का एक दूसरा पहलु ये भी है  की....   अगर वक़्त रहते किसी ने सब सम्हाल लिया या  समझ लिया तो इतना कुछ होने से बच सकता है.... इन्सान गलत रस्ते पे जाने को तब शायद मजबूर ना हो............

Monday, February 28, 2011

.अगर हम न होते तो क्या होता............

मानिए अगर हम ना होते तो क्या होता ...ज्यादा कुछ नहीं पर तब भी बहुत कुछ होता ....... कहना तो आसान है की हम न होते तो कुछ नहीं  होता सब जैसे खुश है वैसे रहते.......पर सच मानिए तो  ऐसा है नहीं .......हम न होते तो यकीन मानिये एक कमी होती हमारे घर मे ... कोई डांट खाने वाला नहीं  होता ना कोई ज्यादा बोलने वाला होता  सो जाहिर सी बात है घर सुना होता, हम ना होते तो हमारी माँ हम जैसी बेटी पाने का अनुभव ना प्राप्त कर सकती ,,, और ना ही  पिता जी हम जैसी  बेटी का सुख पा सकते और अगर बात भाई बहन की जाये तो उनलोगों के बारे मे थोडा दुविधा वाली स्थिति है हो सकता है वो बहुत खुश होते क्योंकी माँ बाप का प्यार उन्हें ही मिलता और ये भी हो सकता है की वो उतने खुश ना होते क्योंकी हम ना होते  उन्हें दुखी करने के लिए... या उनसे बाते करने के लिए ...... यकीन मानिये हमसे जुड़े खास  लोगो की ज़िन्दगी  मे उतनी हल चल ना होती........       अगर बात दोस्तों की करे तो यहाँ थोडा गेहेन सोचने जरुरत है क्यों की यहाँ मामला थोडा नाज़ुक है और मजेदार भी ..... हम ना होते दोस्तों की ज़िन्दगी मे तो ज़िन्दगी जीने का और उसका लुफ्त उठाने का दायरा कम हो जाता  ..... हमारे खास दोस्त हमसे अपनी बाते ना कहते ...... जो बेहद व्यक्तिगत होती है ....  शायद इतना ख़ुशमिज़ाजी भी ना होती.... हमारे दोस्तों के समूह  मे..... क्यों की हमारा मोबाईल भी ना होता मनोरंजन के लिए..... जो की एक एहम हिस्सा है .... 
अगर बात रिश्तेदारों की की जाये तो उन्हें खासा फर्क शायद ना पड़ता और तो वो लोग शायद खुश ही होते की चलो इतने नखरे करने  वाला कोई  सदस्य तो नहीं  है ...... पर कुछ तो थोड़े निराश भी होते ..... हमे न पाकर . ख़ैर  जो भी हो .......  सच तो तभी पता चलता जब हम न होते...!!!!!!!!!!!

Wednesday, February 16, 2011

GURU... . . . . . . .

Teacher यानि गुरु या और आसान शब्दों मे कहे  तो वो जो हमे सिखाता या समझाता है और वो जरुरी नहीं की हमारा वो स्कुल या कॉलेज का गुरु हो , वो कोई भी हो सकता है,जैसे की हमारा अपना,हमारा दूर  का रिश्तेदार  या राह चलता कोई भी शख्स..... वैसे हम कई बार खुद से भी कई चीज़े सीखते है..कई बार हमारी ज़िन्दगी ही जाने अनजाने मे  हमे बहुत कुछ सिखा जाती है पर उस वक़्त हम समझ  नही पाते. वैसे हमारी ज़िन्दगी जैसा टीचर कोई हो नही सकता क्योंकी  वो हमारे जन्म लेने से हमारी मौत तक हमारे साथ रहती है और हमे हर  पल कुछ न कुछ   सिखाती है. और साथ ही हमे ये भी सिखाती है की हमे किसी भी हाल मे कही रुकना नही चाहिए बस चलते रहना चाहिए ...........पर ये भी सच है की हमें  अहसास तब होता है उस सीख का , जब देर हो चुकी  होती है .
वैसे तो अगर गुरु की बात की जाये तो हमारे माँ बाप भी गुरु होते है जो हमारा बहुत साथ देते है ... और हमे सिखाते है,समझाते है ... ज़िन्दगी भर.
टीचर की बात करते करते , मुझे कुछ धुन्दला सा याद आ  रहा है ....... काफी पुरानी बात है जब हम 7th या,8th मे होंगे हमारी एक हिंदी की मैम हुआ करती थी जो हमे म्यूजिक भी सिखाती थी ,,,न जाने उन्हें हम मे क्या दिखता था की कोई भी छोटा बड़ा स्कूल मे function होता था तो वो हमारे पीछे ही पड़ जाती थी गाने के लिए .... और हम उतना ही उनसे भागते थे ,, और कोशिश करते थे की उनके सामने ना आ पाए.... पर वो तो टीचर थी जो हमे कही से भी ढूंड लेती थी और गाना भी ग़वा ही लेती थी ,हम बड़ा परेशान रहते थे की उन्हें कोई और क्यों नही मिलता है...... पर आज याद आती है उनकी,की एक तरह से वो अच्छा  ही करती थी .... जो हमे कुछ सिखाना चाहती थी पर हम भागते थे.
  वैसे टीचर का जिक्र आते ही ,,,,, वो क्लास रूम ,वो खौफ ,वो डांट,वो स्कूल के दिन, सब सामने आने लगता है,,.... और कुछ लोगो का चेहरा भी सामने घुमने लगता है जिससे  हम या  तो डरते थे या बहुत मानते थे ....आज वो भले हमारे साथ न हो लेकिन  उनकी  कुछ अच्छी  यादे तो कुछ कडवी यादे है जो सब याद कर के  आँखों के सामने एक जाल बना लेती है.और हमे सोचने पे मजबूर कर देती है की जो बीत गया वो पल अच्छा  था या जो वक़्त अभी है वो अच्छा  है ....................
 वक़्त चाहे जो  भी हो,हम चाहे जहाँ भी रहे, कैसे भी रहे ........... पर हमारी ज़िन्दगी हमे हर कदम पे कुछ न कुछ सिखाती रहेगी और अहसास दिलाती रहेगी की सीख़ने की कोई उम्र कोई समय नहीं होता ... बस हालात  होते है  जो सही गलत का अंदाजा कराते है....
....TEACHING IS THE PROFESSION THAT TEACHES ALL THE PROFESSIONS.

Sunday, February 13, 2011

teekdi.............. . . .

वैसे तो आपने सुना होगा तीन तीगाडा काम बिगाड़ा.....पर यहाँ थोडा अलग हिसाब है ,आप सोच रहे होंगे कैसा हिसाब... हां तो वही बताने के लिए तो हम ये लिख रे है..
         आपको टाइटल  से अंदाजा हो रहा  होगा की तिकड़ी से related है तो तीन का खेल होगा... तो आइये शुरू करते है .......   कहानी है  ........................... नेहा,अनमता,भावना की 
..जो बचपन के दोस्त तो नहीं है  पर उनकी दोस्ती देखकर लगता यही है की बचपन से जानते है एक दुसरे को और वो साथ है करीब ढाई साल से बस और वो मिले है lucknow university के b.j .m .c प्रोग्राम मे  ...... स्वभाव मे तीनो एक दुसरे से बिल्कुल अलग पर तब भी गहरे दोस्त है...क्लास मे रोज़ नए रिश्ते बनते बिगड़ते है,पर ये तीन जस के तस है,शुरू से अब तक , ऐसा नहीं की इनके बीच लड़ाई झगडा नहीं होता,होता भी है और बोल चाल भी बंद होती है पर वही बात एक दुसरे से बिना बात किए ये रह भी नहीं पाती सो रो गा कर ,रूठे को मन कर ये फिर से चालू हो जाती है... आप सोच रहे होंगे इसमें खास क्या है,तो हम बता दे खास है इनकी जबरदस्त दोस्ती और उस दोस्ती का रंग..... तीनो मे खास है उनका मजाकिया स्वभाव.और सबकी बजाना भी पर ये काम तबी होता है जब तीनो की तिकड़ी बैठती है.... हां और साथ ही साथ इनके चेहरे पे हर वक़्त रहने वाली मीठी सी मुस्कान........जो सारा हाल बयां कर देती है.
एक है जिसके लिए कहा जाता की उसका स्वभाव है थोडा शांत,शालीन वो है नेहा और थोड़ी सी शर्मीली भी  ... तो वही दूसरी जिसका स्वभाव है थोडा चंचल,और थोडा सा गुस्सैला और हमेशा लड़ाई के लिए तैयार रहना.. वो है हमारी  भावना जी,और वही तीसरी का स्वभाव तो बस ............नटखट,talkitive ..... बिंदास रहना वो भी सबसे हट के..... वो अनमता के अलावा कोई हो ही नहीं सकता. 
जब ये तीनो मिल बैठती है तो लगता है की हा,they are full of life,and full of entertainment . इनकी दोस्ती के कई रंग भी और कई स्वाद भी है, जैसा की हर रिश्ते मे होता है... खट्टा मीठा स्वाद... और थोडा सा तीखा भी. 
     वैसे तो इनमे  दो शख्स और है जो रंग भरते है पर वो अक्सर coverage एरिया से बहार ही रहते है और वो है   ....  bhawna kapoor और pransha. जब ये पाचो साथ मे हो फिर तो आप  भूल जाइये की आपको  अब कोई notice करने वाला है ... एक दम अपने मे मस्त,दुनिया से बेखबर और जब तक साथ है ,तब तक बात्तिसी दिखती रहेगी. .... और हो भी क्यों न इनलोगों का मिलना  होता भी तो ६ महीने पे है.
आइये एक हाल ही का किस्सा बताते है आपको..जिसमे थोड़े आंसू और  बहुत सारा प्यार है. सुबह का वक़्त था रोज़ की तरह सब  लोग मिले,बात चित का सिलसिला भी शुरू हुआ ... पर न जाने अचानक से क्या हुआ की  तीनो के बीच मे थोड़ी अनबन हो गयी . और  साथ रह कर भी आपस मे बोल नहीं  रहे थे .... पर  साथ वालो को इस बात का अंदाजा नही हो पाया था... तीनो शांत थे ,,,, फिर  डार्लिंग फ्रेंड अनमता टहलते हुए युही एक गाना सुन री थी जो की थोडा दर्द भरा था.... गाना कुछ यु था ..... ये दिल ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया और आवारगी............... तो अचानक गाना सुनते सुनते उसकी आँखों से आंसू आ गये और जब हमने देखा तो हम और भावना उसकी तरफ दौड़ पड़े और hug  कर लिया.. फिर क्या था हम तीनो एक दुसरे से लिपट गये और सबकी आँखों मे आंसू आ गये और पूरा माहोल सेंटी हो गया... फिर एक दुसरे को लव यू बोला ,,,सॉरी कहा......... फिर धीरे धीरे माहोल नोर्मल हुआ......... उस दिन एहसास हुआ की हम लोग कितना close आ चुके है. ...और कितना प्यार भी है हमारे बीच. ......
        धीरे धीरे कैसे ये वक़्त बीत गया पता भी नहीं चला ,और वैसे वैसे हमारी दोस्ती परवान भी चढ़ गयी ...... अब आने वाला वक़्त बताएगा.. इस दोस्ती का रंग कितना और चढ़ता  है...
हमेशा याद आएंगे ये पल,ये दोस्ती,ये मस्ती....
                                                                                                                                with lots of love...

Sunday, January 30, 2011

manish babu ki kahani hamari jubani..............

एक ऐसा शख्स हमारी क्लास का जिसे समझना थोडा मुश्किल है, जो एक अनसुलझी पहेली की तरह है और अपने आप मे एक अजीब ही कैरक्टर है.. नाम है मनीष.
Zindagi ...kaisi hai paheli, haaye
Kabhi to hansaaye kabhi ye rulaaye
Zindagi...   
  
जिनका स्टाइल अपने आप मे विचित्र है वो,कब,कहा,क्या बोल दे या क्या कर दे इसका भी कोई भरोसा नहीं.है तो वो आम इंसानों की तरह ही पर  लोगो की ऐसी तैसी करना तो जैसे उनकी hobby हो .उनका मिजाज कुछ इस तरह है की उनकी हर चीज़ एक दम extreame लेवल पर होती है. जैसे दोस्ती ,या किसी से मजाक करना या उनका गुस्सा ही क्यों न हो या बात हो रिश्ते निभाने की.पर वो सबसे जल्दी रिश्ते बनाते भी नहीं है.उनके बोलने का अंदाज़ काफी बेख़ौफ़ और बेबाक है. दोस्तों का साथ उन्हें कुछ ज्यादा भाता है .वैसे तो सभी को भाता है पर उन्हें कुछ ज्यादा ही .
उनका मिजाज कुछ यु है की,उनके ऊपर कितनी भी मुश्किलें आ जाये वो कभी जाहिर नहीं होने देते और चेहरे पे शिकन नहीं आने देते और हस्ते-मुस्कुराते रहते है .और अपने तक ही रखते भी है. वैसे वो थोड़े से frustate भी लगते है.मतलब की जैसे हर वक़्त परेशान रहना और अपने चेहरे की हँसी के पीछे अपनी परेशानी छुपाने की कोशिश करना .
टीचर्स को बिल्कुल झुक के और हाथ जोड़ के कहना 'गुरु जी प्रणाम' तो जैसे उनका स्टेटस सिम्बल  है.... और उनके स्टेटस सिम्बल मे लोगो को कमेन्ट करना भी आता है.इनसे जब आप बात करेंगे तो आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते  की आपकी कौनसी बात पे ये महाशय क्या जवाब दे दे ... ये अक्सर वही बोलते  है जिसकी आपको उम्मीद न हो.
क्लास के शुरूआती दौर मे इनसे कोई ज्यादा बातचीत नहीं होती थी क्यों की ये भी अपने मे रहना पसंद करते थे और हम भी , पर समय के साथ साथ बातचीत का सिलसिला भी काफी बढ़ गया. और हम इनको पहले से ज्यादा जान गए .इनकी चाल को देखकर लगता है की या तो ये किसी से लड़ कर आ रहे है या जा रहे है लड़ने .मगर ऐसा होता नहीं है क्योंकि इनकी चाल का अंदाज़ ही कुछ ऐसा है.......
            कुछ व्यक्यिगत अनुभव जो अब तक के सफ़र मे रहे है इनके साथ :-
 ...अभी कुछ दिन पहले का वाक्या है.. हमें इन्टरनेट कनेक्शन लेना था तो बातों बातों मे हमने इनसे पुछा.....  तुम्हारे पास कौन सा कनेक्शन है 2G या 3G ... तो मनीष जी का जवाब था 4G ....लेना है??????????? 
   अब बताइए कोई इसके आगे क्या कहे...... ये तो था इनका एक रूप तफरी वाला .
पर इनका एक रूप ये भी है  ........................
ये वाक्या जरा पुराना है............. प्रथम सेमेस्टर के आस पास का .
उस समय हम सब उतना परिचित नहीं थे आपस मे .. क्लास के बाद ब्रेक का समय था तो हम लड़किया ऐसे ही घुमने या कह लीजिये मुड़ फ्रेश करने बहार आ गए और कुछ लडकियों के बैग क्लास मे थे जिनमे से एक हमारा  भी था,और जब कुछ टाइम बाद  वापस लौटे तो देखा हम सभी के बैग से सारे रुपये जा चुके थे...(आज तक पता नहीं चला किसने चुराए थे) हम सब हैरान परेशान हो चुके थे ये सोच कर की घर वापस कैसे जायेंगे ..तो मनीष जी आगे आये हमारी मदद के लिए और इन्होने हमें घर तक का किराया दिया... हमें यकीन नहीं था की ये भी मदद कर सकते है. क्योंकि उस वक़्त हमारे जहन मे इनके प्रति राय कुछ और ही थी ... और उस घटना के बाद से हमारी राय भी बदल गयी ... और तब से ये विश्वास  जागा की ये एक मददगार शख्स है............... और ये भी इनका एक अलग ही रूप था....
 तो अगर इनको देखा और समझा जाये तो ये ऐसे शख्स है जो  
बहुमुखी चरित्र अपने मे समेटे हुए है..........